जयकिशन 50वीं पुण्यतिथि विशेषः शंकर-जयकिशन की संगीत रचना मेलोडी और रवानी का सरल आख्यान

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मुंबईः फिल्म बरसात (Barsaat) की मेलॉडिकल रवानगी से शुरू हुई शंकर-जयकिशन (Shankar Jaikishan) की धुनों की इस यात्रा का अगला पड़ाव थी फिल्म आवारा (1951) . जहां फिल्म संगीत को एसजे ने यूं कहे तो आख्यान में बदल दिया. फिल्म की बुनावट में संगीत (चाहे वह बैकग्राउंड/पार्श्व संगीत हो या गीतों की रचना) जिस हद तक शामिल था, शायद ही हिन्दी फिल्मों के इतिहास में कोई दूसरा उदाहरण मिले. तभी तो इस फिल्म के बैकग्राउंड म्यूजिक के टुकड़ों का इस्तेमाल अन्य फिल्मों में भी कई बार किया गया. यहां पर आवारा के एक गीत का जिक्र जरूरी है. राजकपूर को फिल्म बावरे नैन का राग दरबारी पर आधारित एक गीत, तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं वापस बुला ले …..काफी पसंद था. अपने उस्ताद केदार शर्मा की इस फिल्म में राजकपूर गीता बाली के साथ मुख्य भूमिका में थे जबकि संगीत रौशन का था. राज साहब चाहते थे कि फिल्म आवारा में इस गीत को हूबहू ले लिया जाए. लेकिन इसकी इजाजत उन्हें केदार शर्मा से नहीं मिली. तब उन्होंने शंकर जयकिशन को इसी गीत को ध्यान में रखकर एक गीत रचने की जिम्मेदारी दी. और एसजे ने जो बेमिसाल गीत रचा वह था, हम तुझसे मोहब्बत करके सनम रोते भी रहे हंसते भी ……. आवारा के ड्रीम सीक्वेंस (स्वप्न दृश्य) के बगैर तो बात पूरी हो ही नहीं सकती. इस सीक्वेंस को एसजे ने तीन गीतों से पूरा किया. सीक्वेंस का शुरुआती गीत था ….तेरे बिना आग ये चांदनी, दूसरा गीत था …. मुझको चाहिए बहार… और इस सीक्वेंस की समाप्ति होती है, ….घर आया मेरा परदेसी से. हिंदुस्तानी फिल्मों के इतिहास में ऐसा ड्रीम सीक्वेंस फिर कभी देखने को नहीं मिला. हालांकि इस सीक्वेंस का अंतिम गीत घर आया मेरा परदेसी को लेकर एसजे पर नकल/कापी के आरोप भी लगते हैं. हां यह बात सही है कि इस गीत की संगीत रचना एसजे ने मिस्र की गायिका उम्म कुलथुम (कुलसुम) के एक गीत के आधार पर ही की थी. लेकिन अगर आप ध्यान से सुनेंगे तो आपको यह जरूर लगेगा कि मैंडोलिन के गजब के इस्तेमाल और अपने जादुई ऑर्केस्ट्रेशन से एसजे ने इस गीत को अपने विशिष्ट रंग के साथ हीं अपने प्रिय राग भैरवी में भी ढाल दिया है. एसजे हमेशा कहते थे कि हमें बाहर की धुनों से प्रेरणा लेने में कोई दिक्कत नहीं है बशर्ते हम उसकी हूबहू कॉपी न करें.

बात करते हैं धुनों की सरलता पर. आवारा के सारे के सारे गाने को ले लीजिए आज तक लोगों की जुबान पर चढे हुए हैं. लेकिन सहजता और सरलता को कुछेक जानकार अक्सर अ गंभीर बताने की भूल कर बैठते हैं. इस सरलता की वजह पर कभी बात नहीं होती है. मेरा मानना है कठिन रचना आसान है लेकिन कठिन को आसान बनाकर लोगों के सामने पेश करना कितना चुनौतीपूर्ण है ये बात वही लोग कर सकते हैं जो उस विधा में पारंगत तो हों ही साथ ही मीडियम की जरूरत को भी भलीभांति समझते हों. जो दौर शंकर जयकिशन का था, उस दौर में इस बात की गुंजाइश कम ही थी कि बगैर फिल्मों की सफलता के आपके गीतों को सफलता मिले. ऐसे बहुत सारे संगीतकार हुए जिनके कंपोजिशंस तो बेहद उम्दा थे लेकिन फिल्मों के नहीं चलने की वजह से उस समय वे गीत भी लोगों की जुबान पर नहीं चढ़ पाए. यानी सिने संगीत की लोकप्रियता उस समय पूरी तरह से निर्भर करती थी फिल्मों की सफलता पर. शंकर जयकिशन इस बात को बखूबी समझते थे. और इसी समझ के चलते उनके गीत इतने सहज सरल और असरदार हुए.

आवारा के बाद शंकर जयकिशन का संगीत बतौर आख्यान फिल्म श्री चार सौ बीस (1955) में आया. कहें तो आर के बैनर की फिल्मों में उनकी संगीत रचना हमेशा आख्यानपरक ही रही. चाहे आप उनकी और फिल्मों की भी बात कर लें यथा…. जिस देश में गंगा बहती है, संगम, मेरा नाम जोकर. एसजे ने अपनी फिल्मों में बहुत से पश्चिमी वाद्य यंत्रों का गजब इस्तेमाल किया उसी में कुछेक हैं, अकार्डियन, पियानो, मैंडोलिन, ओबाउ, ….वगैरह . फिल्म श्री चार सौ बीस के सबसे लोकप्रिय गीत, मेरा जूता है जापानी में आप अकार्डियन का जादू महसूस कर सकते हैं. राग भैरवी पर आधारित इस गीत को लेकर शंकर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने फिल्म के सिचुएशन के हिसाब से 5 धुनें बनाई थी. लेकिन जब वो राज साहब को सुनाने लगे तो एक एक कर उन्होंने शुरू के तीन धुनों को रिजेक्ट कर दिया. लेकिन चौथी धुन को सुनकर उन्होंने फौरन हामी भर दी. जबकि शंकर के मुताबिक चौथी धुन शुरू के तीन धुनों से उन्हें कमजोर लग रहा था. क्योंकि जो धुन उन्हें सबसे ज्यादा पसंद था उसको उन्होंने राज साहब को सबसे पहले सुनाया. लेकिन शंकर ने फिर कहा कि हो सके उनकी पसंद के धुनों में राज साहब को वह विजुअल प्रभाव/असर न दिखा हो जो वे पर्दे पर उतारना चाह रहे हों. और यह सबको पता है कि इस गीत ने इतिहास रच दिया. वी बलसारा द्वारा तीनों सप्तक में कमाल के बजाए गए हारमोनियम से सजा फिल्म आवारा का टाइटल गीत, आवारा हूं .. की तरह यह गीत भी सिर्फ देश में ही नहीं विदेशों में भी काफी लोकप्रिय हुआ. इस वाकये के जिक्र का मकसद मेरा यह है कि फिल्म के संगीत को सिर्फ संगीत के नजरिए से देखना बेमानी है. फिल्म के गीत तभी सफल हैं जब वे सिचुएशन के मुताबिक विजुलाइज हों. अगर ऐसा नहीं तो फिर न गीत और न फिल्में सफल होगी. भैरवी पर आधारित होने के बावजूद इस फिल्म के एक और गीत रमैया वस्तावैया… को देखिए. रंग बिल्कुल जुदा है.

आरके बैनर से इतर भी उनकी फिल्मों का संगीत लाजवाब रहा. पतिता, सीमा, दाग, यहूदी, बसंत बहार, चोरी चोरी, आम्रपाली, तीसरी कसम उनकी कुछ ऐसी फिल्में हैं जिसके गीत हर कसौटी पर खरे उतरते हैं. फिर वह चाहे शास्त्रीयता हो या लोकसंगीत या फिर भारतीय व पश्चिमी वाद्य यंत्रों का अद्भुत संयोजन हो. कुछ गीतों को आप सुनकर देखिए. फिल्म सीमा (1955) का राग दरबारी पर आधारित भजन तू प्यार का सागर है…, या इसके और भी गीत जैसे, कहां जा रहा है तू ए जानेवाले…, भैरवी पर आधारित सुनो छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी….., जयजयवंती पर आधारित मनमोहना बड़े झूठे… पतिता (1953) के गीत, किसी ने अपना बना के मुझको मुस्कुराना सिखा दिया (भैरवी पर आधारित) …. याद किया दिल ने कहां हो…. मिट्टी से खेलते हो बार बार किसलिए…. या है सबसे मधुर वो गीत… जो अंग्रेजी के महान रोमांटिक कवि शेली की रचना ‘टू ए स्काइलार्क’ का हिन्दी अनुवाद था. किसी रचना का इतना बेहतर अनुवाद फिल्म संगीत में और नहीं मिलेगा. और इस अनुवाद को किया था महान गीतकार शैलेंद्र ने.

जो लोग शास्त्रीयता की बात करते हैं उन्हें फिल्म बसंत बहार (1956) के गीतों को सुनना चाहिए. जैसे मियां मल्हार पर आधारित भय भंजना वंदना सुन हमारी…. राग तोडी पर आधारित दुनिया न भाये मोहे अब तो बुला ले… झिंझोटी पर आधारित जा जा रे जा बालमवा….. भैरवी पर आधारित इसी फिल्म के गीत, मैं पिया तेरी तू माने या ना माने … के इंटरल्यूड में पन्नालाल घोष की बांसुरी का गजब इस्तेमाल है. इस फिल्म मे तो मन्ना डे और पंडित भीमसेन जोशी की राग बसंत बहार पर आधारित एक जुगलबंदी भी थी, केतकी गुलाब जूही चंपक बन फूले….

अब बात करते हैं फिल्म चोरी चोरी (1956) की. जब इस फिल्म की बात आती है तो मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अगर शंकर जयकिशन नहीं होते तो शायद ही मन्ना डे के रेंज का, उनकी रूमानी गीतों का हम लुत्फ उठा पाते. चोरी चोरी का गीत, ये रात भीगी भीगी, ये मस्त फिजायें .. हिन्दी फिल्म संगीत की एक श्रेष्ठ रूमानी युगल रचना है. इसी फिल्म के और भी गीत मन्ना डे की आवाज में मसलन, आजा सनम मधुर चांदनी में हम…. या लगता नहीं है दिल यहां….. की भी कोई मिसाल नहीं. और एक गीत जिसके बगैर इस फिल्म के संगीत पर बात पूरी नहीं होगी. शुद्ध कल्याण पर आधारित वह गीत था लता की आवाज में रसिक बलमा……

अमिय चक्रवर्ती की दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म दाग (1952) का तलत महमूद का गाया भैरवी पर आधारित गीत ऐ मेरे दिल कहीं और चल…… में जिस तरह की स्वर लहरी का प्रयोग हुआ है, शायद ही किसी अन्य गीत में देखने को मिले. इस फिल्म के और भी गीत बेमिसाल हैं मसलन लता की आवाज में, काहे को देर लगाई रे……प्रीत ये कैसी बोल रे दुनिया….(राग पहाडी) . इस फिल्म में तलत के गाए अन्य गीत हम दर्द के मारों का इतना ही फसाना है….या कोई नहीं मेरा इस दुनिया में….. सोज का गजब असर पैदा करते हैं.

दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म यहूदी (1958) का गीत ये मेरा दीवानापन है…. जिसके लिए हिन्दी फिल्मों का सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पहला फिल्म फेयर अवॉर्ड गीतकार शेलेंद्र को मिला को सुनिए और एसजे का कमाल देखिए. इसी तरह वैजयंती माला अभिनीत आम्रपाली (1966) का राग हमीर पर आधारित जाओ रे जोगी तुम जाओ रे…… को सुनिए. और लोक संगीत की शीतलता और टीस महसूस करनी हो तो फिल्म तीसरी कसम (1966) के सारे के सारे गीत को सुन डालिए. मसलन, सजन रे झूठ मत बोलो…. दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई…. पान खाए सैंया हमारो…. लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया…. चलत मुसाफिर मोह लियो रे….हाय गजब कहीं तारा टूटा……सजनवा बैरी हो गए हमार…. . हालांकि ‘तीसरी कसम’ की रिलीज के चंद महीनों बाद ही 14 दिसंबर 1966 को फिल्म के निर्माता शैलेंद्र का निधन हो गया और 17 वर्षों के अटूट साथ के बाद अधूरी हो गई एसजे की टीम.

पचास के दशक की शंकर-जयकिशन की और भी बहुत फिल्में हैं जिसके गीत एक से बढ़कर एक थे. सबसे बड़ी बात इन गीतों में गजब की रवानी और मेलोडी थी. ज्यादा का जिक्र तो यहां संभव नहीं है. लेकिन कुछेक का तो कर ही लेंगे. वर्ष 1951 की फिल्म बादल के गीत, उनसे प्यार हो गया……रोता है मेरा दिल…. मैं राही भटकनेवाला हूं. इसी साल आई फिल्म काली घटा का गीत हमसे न पूछो कोई प्यार क्या है….. क्या गजब के रूमानी गीत हैं. ठीक इसके अगले साल आने वाली फिल्म पूनम के गीत मसलन, दिन सुहाने मौसम बहार का …..आई आई रात सुहानी…… झूमे झूमे दिल मेरा चंदा की चांदनी में झूमे झूमे. इसी साल शंकर जयकिशन की एक और फिल्म आई थी नगीना. जिसमें सीएच आत्मा का केएल सहगल के रंग में गाया गीत रोऊँ मैं सागर के किनारे …….उस समय काफी लोकप्रिय हुआ था. लता की आवाज में इसी फिल्म के एक और गीत, हो कैसी खुशी की है रात… की मेलोडी भी दिल को छू जाती है. इसी वर्ष यानी 1952 की फिल्म परबत के एक गीत हाय मेरा दिल ले गया कोई आके इशारों से….. को भी वक्त मिले तो सुनिए और महसूस कीजिए मुहब्बत की मद्धम आंच में शीतल टीस और चुभन .

1953 में राजकपूर और नरगिस अभिनीत फिल्म आई थी ‘आह’ जिसका निर्देशन राजा नवाथे ने किया था. भैरवी पर आधारित लता के गाए गीत, राजा की आएगी बारात…. में मेलांकली के रंग में जो मेलोडी है वह गजब का है. इस गीत के प्रील्यूड में बिना किसी ऑर्केस्ट्रेशन लता की आवाज का गजब इस्तेमाल है. प्रील्यूड से लेकर इंटरल्यूड के शुरू होने तक लता की पूरे गले की आवाज का ढोलक की थाप (रिदम) और रोते हुए वायलिन के साथ गजब का संयोजन है. कैरेक्टर और सिचुएशन के मुताबिक अंतरे के स्केल में जो बदलाव किया गया है उसे आप सिर्फ आंख बंदकर महसूस कर सकते हैं. दूसरे अंतरे के अवरोह यानी, जब जब उनकी याद आएगी…. में लता ने मैंडोलिन के साथ जिस तरह से स्वर को धीमा किया है. लगता है कैरेक्टर यानी नरगिस का दर्द आँखों से धीरे धीरे रिस रहा हो. इस गीत में एक नोट (स्वर) का भी हेर फेर आपको देखने को नहीं मिलेगा. शंकर-जयकिशन के यहां म्यूजिक को इतने बाकमाल ढंग से अरेंज करने की जिम्मेदारी सेबेस्टियन डिसूज़ा और दत्ताराम के हाथों में थी. इस फिल्म के और भी गीतों का क्या कहना मसलन आजा रे अब मेरा दिल पुकारा….. ये शाम की तन्हाईयाँ….. जाने न नजर…. सुनते थे नाम हम जिनका बहार से…..

भैरवी की हीं अनुगूंज लिए फिल्म मयूरपंख (1954) का लता का गाया गीत खुशियों के चांद मुस्कुराये रे……. में जो रूमानी बयार है, उस पर दिल झूम झूम जाता है. पांचवें दशक की शुरुआत में लता मंगेशकर का सबसे ज्यादा और विविध इस्तेमाल शंकर-जयकिशन ने किया. कुछेक फिल्मों के तो सारे के सारे गीत लता के हीं थे. यह कहना बेजा न होगा कि लता की पहचान को निखारने में एसजे का बहुत बड़ा योगदान था.

वर्ष 1957 में आई फिल्म कठपुतली का टाइटल गीत, बोल री कठपुतली ….. हो या हाय तू ही गया मोहे भूल रे….. या इतने बडे जहाँ में ऐ दिल …..सब बेजोड हैं . ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित फिल्म अनाड़ी (1959) के गानों का तो क्या कहना. मसलन सब कुछ सीखा हमने, किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, तेरा जाना दिल के अरमानों का लुट जाना….. क्या बाकमाल गीत हैं. और ठीक इसके अगले वर्ष यानी 1960 में आई आरके बैनर की फिल्म, जिस देश में गंगा बहती है. इस फिल्म के सारे के सारे गीत काफी लोकप्रिय हुए थे लेकिन जो गीत मुझे सबसे ज्यादा पसंद है वह है राग बसंत मुखारी पर आधारित ओ बसंती पवन पागल …. ये तो उनकी अमर रचनाओं की महज एक बानगी है. इसके अलावे उनकी और भी बहुत सारी फिल्में हैं जिसके गीत लोगों के दिलों पर आज भी राज करते हैं.

यहां छठे दशक की उनकी सुमधुर संगीत रचनाओं का जिक्र नहीं कर सका. इसपर कभी अलग से बात करूंगा. हालांकि शंकर जयकिशन के इस दशक के उत्तरार्द्ध के गानों पर व्यावसायिकता का दबाव दिखा. इसमे फिल्म संगीत में हो रहे बदलाव को भी आत्मसात करने की उनकी कोशिश थी. हालांकि इस दौर में भी उनके गीत काफी सफल रहे. इस बात को आप इसी से समझ सकते हैं कि वर्ष 67, 69, 71, 72 और 73 का बतौर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार फिल्म फेयर अवॉर्ड शंकर-जयकिशन को मिला. इससे पहले भी वर्ष 57, 60, 61 और 63 के लिए इस जोड़ी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिल चुका था, जबकि सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के लिए फिल्म फेयर अवार्ड की शुरुआत ही वर्ष 1954 से हुई थी. वर्ष 55, 61, 62, 64, 66 और 71 में इस जोड़ी के गीत सालाना बिनाका गीतमाला में पहले पायदान पर रहे. लेकिन पांचवें और छठे दशक के शुरुआती वर्षों में जो जादू और मेलोडी उनके गीतों में था, वैसा रंग कुछेक गीतों को छोड़कर छठे दशक के उत्तरार्द्ध के गानों में नहीं दिखा. खैर इसकी और भी बहुत सारी वजह हैं. और आखिर 12 सितंबर 1971 को इस जोड़ी के जयकिशन सिर्फ 42 साल की उम्र में इस जहान-ए-फ़ानी से कूच भी कर गए.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)





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