अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की रिसर्च: डिप्रेशन की दवा ‘फ्लूवोक्सामाइन’ कोविड होने पर हॉस्पिटल में भर्ती होने का खतरा घटाती है, यह इम्यून सिस्टम को बेकाबू होने से भी रोकती है

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3 घंटे पहले

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सस्ती, सुरक्षित और आसानी से उपलब्ध होने वाली डिप्रेशन की दवा से कोविड को गंभीर होने से रोका जा सकता है। यह दावा अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। शोधकर्ताओं का कहना है, डिप्रेशन में दी जाने वाली दवा ‘फ्लूवोक्सामाइन’ कोरोना के मरीजों में साइटोकाइन स्टॉर्म के असर को कम करती है। साइटोकाइन स्टॉर्म वो स्थिति है जब शरीर को रोगों से बचाने वाला इम्यून सिस्टम ही नुकसान पहुंचाने लगता है।

कनाडा के मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एडवर्ड मिल्स का कहना है, वर्तमान में कोरोना के मरीजों के लिए चुनिंदा इलाज ही उपलब्ध है। ऐसे में यह दवा मरीजों को राहत दे सकती है।

क्या होता है साइटोमाइन स्टॉर्म, पहले ये समझें
फ्रंटियर्स इन इम्यूनोलॉजी’ जर्नल में पब्लिश रिसर्च कहती है, कोरोना से संक्रमण के बाद कई मरीजों में रोगों से बचाने वाला इम्यून सिस्टम ही बेकाबू होने लगता है। आसान भाषा में समझें तो इम्यून सिस्टम इतना ओवरएक्टिव हो जाता है कि वायरस से लड़ने के साथ शरीर की कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचाने लगता है।

ऐसा होने पर मरीजों के शरीर में खून के थक्के जम सकते हैं और ऑक्सीजन की कमी हो सकती है। ये दिक्कतें मरीज की हालत को और बिगाड़ती हैं। वैज्ञानिक भाषा में इसे ही साइटोकाइन स्टॉर्म कहते हैं।

रिसर्च की 4 बड़ी बातें

  • अमेरिका, कनाडा और ब्राजील के वैज्ञानिकों ने मिलकर कोरोना के 1,472 मरीजों पर स्टडी की। इन मरीजों को डिप्रेशन की दवा ‘फ्लूवोक्सामाइन’ दी गई।
  • दवा लेने वाले संक्रमित मरीजों में इम्यून सिस्टम के बेकाबू होने के मामलों में 30 फीसदी की कमी आई। शोधकर्ताओं का कहना है, 50 से अधिक उम्र वालों में कोरोना के गंभीर होने का खतरा ज्यादा रहता है।
  • फ्लूवोक्सामाइन लेने वाले वाले मरीजों को इमरजेंसी में 6 घंटे से भी कम समय तक रहना पड़ा और ऐसे मरीजों के हॉस्पिटल में भर्ती होने का खतरा भी कम पाया गया।
  • रिसर्च के नतीजे बताते हैं, कोविड होने पर फ्लूवोक्सामाइन दवा का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह दवा दुनिया के हर हिस्से में सस्ते दामों पर उपलब्ध है।

बेकाबू इम्यून सिस्टम को रोकने के लिए WHO भी कर रहा ट्रायल
कोविड के मरीजों में संक्रमण के बाद बेकाबू होने वाले इम्यून सिस्टम को रोकने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने हाल में एक ट्रायल शुरू किया है। यह ट्रायल मलेरिया, ल्यूकीमिया और ऑटोइम्यून डिजीज जैसे आर्थराइटिस की दवाओं पर किया जा रहा है।

ट्रायल में शामिल वैज्ञानिकों का मानना है, इन बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली एंटी-इंफ्लेमेट्री दवाएं संक्रमण के बाद बेकाबू होने वाले इम्यून सिस्टम को कंट्रोल कर सकती हैं। इन दवाओं के जरिए कोविड का सस्ता और असरदार इलाज ढूंढने की कोशिश जारी है।

साइटोकाइन स्टॉर्म रोकने के लिए इन दवाओं का भी ट्रायल जारी

  • अमेरिका की वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता कोविड के मरीजों पर फेमोटिडीन दवा का ट्रायल कर रहे हैं। यह दवा सीने में जलन होने पर दी जाती है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस सस्ती दवा के साथ एस्प्रिन देने से संक्रमित मरीज की हालत में सुधार होता है। साथ ही ये साइटोकाइन स्टॉर्म को रोकने का काम करती है।
  • सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी कलौंजी का ट्रायल कोरोना के मरीजों पर कर रही है। वैज्ञानिकों का कहना है, कलौंजी का इस्तेमाल कोविड के इलाज में किया जा सकता है। यह मरीजों के इम्यून सिस्टम को बेकाबू होने से रोकती है और हॉस्पिटल में भर्ती होने का खतरा घटाती है।

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