कोविड के कारण वित्तीय संकट में कर्जदार: 6 महीने या स्थिति सामान्य होने तक ब्याजमुक्त मोरेटोरियम मिले, PIL पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज

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नई दिल्ली12 मिनट पहले

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कोविड-19 के कारण कर्ज लेने वालों के सामने वित्तीय संकट पैदा हो गया है। इससे निपटने के लिए ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका (PIL) में आग्रह किया गया है कि वह केंद्र को इस वित्तीय संकट से निपटने के उपाय करने के निर्देश दे। वकील विशाल तिवारी की ओर से दाखिल इस जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अशोक भूषण और एमआर शाह की वेकेशन बेंच में आज सुनवाई होगी।

याचिका में शामिल प्रमुख मांगें

  • सभी वित्तीय संस्थान टर्म लोन पर ब्याजमुक्त मोरेटोरियम उपलब्ध कराएं।
  • लोन की किस्त जमा करने पर 6 महीने या स्थिति सामान्य होने तक रोक लगाई जाए।
  • लॉकडाउन जैसे प्रतिबंधों से दैनिक मजदूरों की आय प्रभावित हुई है। ऐसे में कर्ज लेने वाले दैनिक मजदूरों की प्रॉपर्टी के खिलाफ 6 महीने तक सख्त कार्रवाई ना की जाए।
  • सुप्रीम कोर्ट सभी वित्तीय संस्थानों को आदेश दे कि 6 महीने तक किसी भी नागरिक की संपत्ति नीलाम ना की जाए। ना ही कोई भी अकाउंट 6 महीने तक नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स, यानी NPA घोषित किया जाए।
  • RBI की ओर से पेश की गई नई री-स्ट्रक्चरिंग स्कीम के तहत 2 साल की समय सीमा को बढ़ाया जाए।

कम होने चाहिए वित्तीय बोझ

याचिका में वकील विशाल तिवारी का कहना है कि लोगों पर वित्तीय बोझ कम होना चाहिए और इससे नागरिकों को अपना सम्मान नहीं खोना चाहिए। वित्तीय नीतियां सरकार बनाती है। लेकिन इस समय मौजूदा वित्तीय नीतियों के अस्तित्व पर ही सवाल उठ रहा है। हमारे देश के लोगों को सम्मान के साथ और बिना किसी तनाव के जीवित रहना चाहिए।

केंद्र-RBI ने कोई कदम नहीं उठाया

याचिका में आरोप लगाया गया है कि कोविड के कारण लोगों के सामने पैदा हुए आर्थिक संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार और RBI ने कोई कदम नहीं उठाया है। ना ही इसका प्रभाव कम करने के लिए किसी वित्तीय पैकेज की घोषणा की गई है। याचिका में कहा गया है कि उत्तरदाताओं ने ऐसा ना करके आजीविका के मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया है। ऐसे में आम जनता के हित में कोर्ट का इस मामले में तुरंत दखल देने जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने मार्च में ब्याज पर ब्याज ना लेने का आदेश दिया था

इसी साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि बैंक लोन लेने वालों से कंपाउंड इंटरेस्ट (ब्याज पर ब्याज) या दंडस्वरूप ब्याज नहीं ले सकते हैं। कोर्ट ने कहा था कि जिन बैंकों ने ब्याज पर ब्याज पर वसूल लिया है, वह ऐसे ब्याज को वापस करें। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मार्च 2020 से अगस्त 2020 के लाए गए लोन मोरेटोरियम पर लागू हुआ था। हालांकि, कोर्ट ने आम लोगों और व्यापारिक संगठनों की मोरेटोरियम के दौरान पूर्ण ब्याज माफी की याचिका को खारिज कर दिया था।

आर्थिक पॉलिसी बनाने का अधिकार सरकार के पास रहना चाहिए

कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि लोन मोरेटोरियम की अवधि के दौरान वसूला गया दंडस्वरूप ब्याज या ब्याज पर ब्याज लौटाने योग्य है। यदि कोई बैंक पैसा लौटाने की स्थिति में नहीं है तो वह इस राशि को लोन की राशि में एडजस्ट कर सकता है। कोर्ट ने कहा था कि आर्थिक पॉलिसी बनाने का अधिकार सरकार के पास ही रहना चाहिए। कोई दूसरा विकल्प होने के बावजूद कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

RBI ने नई री-स्ट्रक्चरिंग स्कीम पेश की है

RBI ने कोविड की दूसरी लहर को देखते हुए हाल ही में एक नई री-स्ट्रक्चरिंग स्कीम को मंजूरी दी है। व्यक्तियों, छोटे व्यवसायों और MSME जिनके पास 25 करोड़ रुपए तक का कुल एक्सपोजर है और जिन्होंने पहले के रीस्ट्रक्चरिंग से कोई लाभ नहीं उठाया है; जिन्हें 31 मार्च, 2021 तक स्टैंडर्ड लोन के रूप में क्लासीफाई किया गया था, वे रेजोल्यूशन फ्रेमवर्क 2.0 के तहत इसके लिए योग्य होंगे। हालांकि, यह बैंकों के ऊपर है कि वे आपको इसका लाभ देंगे या नहीं और किस तरह देंगे?

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