FILM REVIEW ‘ऑपरेशन जावा’: जिंदगी के मायने तलाशती दो बेरोजगार इंजीनियर्स की कहानी

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साइबर क्राइम का विस्तार इंटरनेट से भी ज़्यादा तेज़ी से हो रहा है. मॉर्फ़ की गई तस्वीरों से शुरू होने वाली क्रेडिट कार्ड फ्रॉड, पायरेसी, अश्लील वीडियो से गुज़रते हुए फेक आइडेंटिटी, फेक न्यूज़, हाल ही में एक टीवी चैनल की प्रमुख एंकर के साथ हुए विदेशी जॉब फ्रॉड तक पहुंच गई है. झारखंड के जामताड़ा के असंगठित रूप से उत्तर प्रदेश के नोएडा में चल रहे बड़े-बड़े कॉल सेंटर के किस्से पुलिस और साइबर सेल द्वारा पकड़े जाते रहे हैं. हिंदी फिल्मों में साइबर क्राइम का मतलब पासवर्ड हैक करने से ज़्यादा कभी रहा नहीं है. मलयालम सिनेमा “ऑपरेशन जावा” भी कोई धुआंधार टेक्निकल साइबर क्राइम थ्रिलर नहीं है, बल्कि अपनी पहचान कायम करने के लिए तरसते दो बेरोजगार इंजीनियर्स की कहानी है. ‘ऑपरेशन जावा (Operation Java)’ हाल ही में ज़ी 5 पर रिलीज़ हुई है. फिल्मः ऑपरेशन जावा भाषाः मलयालम ड्यूरेशनः 146 मिनटओटीटीः ज़ी5 अन्थोनी जॉर्ज (बालू वर्गीस) और विनय दासन (लुकमान अवरन), कोच्ची की भीड़ में शामिल दो युवक हैं, जो भीड़ की चलन की वजह से इंजीनियर बन गए, भीड़ की चलन की वजह से ही बेरोज़गार हैं, भीड़ की चलन की वजह से एक ऐसा रोज़गार खोज रहे हैं जो उनकी निराश और अस्तित्वविहीन जिंदगी को कोई मतलब, कोई मायने दे सकें. एक फिल्म प्रोड्यूसर मित्र की मदद से वो फिल्म की पायरेसी करने वाले शख्स तक पहुंचने में पुलिस की साइबर सेल की मदद करते हैं. वहां के कुछ सीनियर लोगों को उनका काम और उनका खोजी दिमाग पसंद आ जाता है और इन दोनों को साइबर सेल में टेम्पररी नौकरी मिल जाती है. अपनी बी.टेक. डिग्री की मदद से ये दोनों कोई न कोई केस सुलझाते हुए नज़र आते हैं. कभी एटीएम फ्रॉड, तो कभी ओटीपी फ्रॉड तो कभी नक़ली अश्लील वीडियो. फिल्म ऐसे ही चलती रहती है, केस सॉल्व होते रहते हैं और इन दोनों की ज़िंदगियों को नए मायने मिल जाते हैं. एक दिन इन टेम्पररी कर्मचारियों का कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म हो जाता है और वो फिर से बेरोज़गार हो जाते हैं. उन्हें अपनी पहचान खोने का इतना डर बैठ जाता है कि वो फ्री में काम करने को तैयार हो जाते हैं. मगर सरकारी आदेश तो सरकारी होता है. फिल्म, इन दोनों को अपनी खाली पेट्रोल टंकी वाली बाइक धकेलते हुए ख़त्म होती है. एक पल के लिए, यहां जाने भी दो यारों के क्लाइमेक्स की याद आ जाती है. फिल्म के निर्देशक तरुण मूर्ति ने ही फिल्म लिखी भी है. स्टोरी टेलिंग की इस विधा में लेखक का कॉन्फिडेंस बहुत महत्वपूर्ण होता है. कहानी बहुत छोटी है, लेकिन इसमें जो लगातार घटनाएं होती रहती है, जिनका आपस में कोई निरंतरता वाला सम्बन्ध नहीं है, वो फिल्म को एक सम्पूर्णता प्रदान करती है. दोनों हीरो कभी साइबर सेल के साथ रेड मारने जाते हैं, कभी खुद ही खरीददार बन कर फ़र्ज़ी वेबसाइट बनाने वाले को पकड़वाते हैं, कभी हाथापाई में भी फंस जाते हैं, कभी फ़र्ज़ी जॉब वेबसाइट के जाल का भंडाफोड़ करते हैं. हर घटना का एक छोटा एपिसोड है, और इन्हीं को कुछ इस अंदाज़ में पिरोया है कि दर्शक बिलकुल बोर नहीं होते. फिल्म में हंसने के लिए कुछ विशेष करने की ज़रुरत ही नहीं पड़ी क्योंकि सिचुएशन ही ऐसी बन रही थी. एक बैंक का मैनेजर खुद ओटीपी फ्रॉड में फंस जाता है. एक शख्स का पासवर्ड होता है 123456. फिल्म की पायरेसी के इलज़ाम में पकडे गए एक नौजवान का वो चेहरा, जब उसकी गर्लफ्रेंड कहती है कि उसका बॉयफ्रेंड कोई और है.
अंग्रेजी फिल्में देख कर हमें लगता है कि साइबर सेल की लोग दुनिया के बड़े-बड़े वाइट कॉलर क्राइम का हल ढूंढ रहे होते हैं, उनके पास एकदम हाई-टेक कंप्यूटर, बड़ी बड़ी स्क्रीन्स, थ्रीडी प्रोजेक्ट्स, लाइव ट्रैकिंग और कमाल के जासूसी इक्विपमेंट होते हैं. ऑपरेशन जावा इस धारणा को तोड़ के रख देता है. साइबर सेल में एक अफसर बूढी औरत को समझा रहा होता है कि एटीएम कार्ड के लिफाफे पर अपना पिन नहीं लिखना है. वहीं एक नौजवान की फेसबुक पर फोटो पोस्ट करने की आदत उसके परिवार पर भारी पड़ जाती है तो अफसर उसे किस तरह लतियाता है. दोनों हीरो, लैपटॉप ले कर छत पर जा कर, सेलुलर टावर के नीचे फ्री इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे होते हैं. ऑफिस के ऐतिहासिक कंप्यूटर देख कर, वो अपना लैपटॉप इस्तेमाल करते हैं. इन सबके बीच एक मानवीय एंगल भी है, जहां एक हीरो अपनी बहन को साइबर क्राइम की वजह से खो चुका है और इसलिए अश्लील वीडियो का केस सुलझाते हुए वो एक बेटी को अपनी पीड़ित मां का साथ देने के लिए प्रेरित करता है. फिल्म ज़बरदस्त है. ऐसा लगता है कि ख़त्म न हो, कोई न कोई केस आता ही रहे मगर इस कहानी का मूल था देश की शिक्षण व्यवस्था और नौकरी पर सवाल उठाना. कुछ कर गुजरने की चाहत रखने वाले नौजवानों को सही दिशा न मिलना, उन्हें उनकी उनकी पसंद की नौकरी न मिलना, समझौते के स्वरुप एक टेम्पररी नौकरी करना और फिर एक दिन उस नौकरी का भी चले जाना. फिल्म आखिर में उन सभी टेम्पररी वर्कर्स को समर्पित की गयी है जो हर साल एक सही नौकरी की तलाश में अपनी जिंदगी के मायने तलाशते रहते हैं और फिर भी असफल रह जाते हैं. ऑपरेशन जावा कोई महान फिल्म नहीं है. ऑपरेशन जावा साइबर क्राइम पर बनी अब तक की सर्वश्रेष्ठ फिल्म भी नहीं है. लेकिन ऑपरेशन जावा, एक ऐसा मानवीय चित्रण है जहां दर्शक फिल्म के कलाकारों से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं, उनकी सफलता और असफलता से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं. फिल्म में एक हीरोइन भी है, जो खुद फेक जॉब रैकेट का शिकार है और अन्थोनी की गर्लफ्रेंड है. इस स्टोरी में काफी गुंजाईश लग रही थी मगर फिल्म का नैरेटिव स्टाइल ऐसा था कि इसे भी एक केस ही समझ कर दिखाया जाना पड़ा. कुल जमा, फिल्म ईमानदार है, निर्बाध रूप से चलती है, और चूंकि साइबर क्राइम से सम्बंधित है तो मज़ा भी आता है. ज़रूर देखना चाहिए.





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