फिल्म रिव्यू: बंटवारे के बारे में कुछ नया नहीं बताती गुरिंदर चड्ढा की ‘पार्टीशन-1947’

0
73
Article Top Ad


पार्टीशन 1947. गुरिंदर चड्ढा की वो फिल्म जिससे वो इमोशनली बहुत जुड़ी हुई हैं. लेकिन फरवरी में दुनिया भर में रिलीज होने के बाद 18 अगस्त को भारत में रिलीज हो रही यह फिल्म दर्शकों के साथ जुड़ाव बना पाएगी, इसकी उम्मीद कम ही लगती है. अंग्रेजी भाषा में यह फिल्म ‘वाइसरॉय हाउस’ नाम से रिलीज हुई है. अगस्त 1947 के बंटवारे की पृष्ठभूमि में स्थापित एक लव स्टोरी होने का दावा करती यह फिल्म बहुत सतही लगती है. ‘बेंड इट लाइक बेकहम’ और ‘प्राइड एंड प्रेज्यूडिस’ जैसी फिल्मों में लंदन में रह रहे भारतीयों की जिंदगी की झलक दिखाने वाली गुरिंदर चड्ढा ने इस फिल्म में भारत में अंग्रेजों की जिंदगी दिखाई है. लेकिन अब तक कई शानदार फिल्में बना चुकीं गुरिंदर का यह प्रयास फीका लगता है.
कहानी: 2 स्टारसाल 1947 का दिल्ली कैसा था? हर तरफ दंगे भड़कने लगे थे. हिंदू-सिख और मुसलमान हर छोटी-छोटी बात पर एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे. यानी हालात कुछ आज जैसे ही थे. अब अंग्रेजों ने भारत को आजाद करने का फैसला कर लिया था. इस काम को पूरा करने के लिए डिकी माउंटबेटन को भारत का आखिरी वाइसरॉय बनाकर भेजा गया था. उसी वाइसरॉय हाउस में काम करता था एक हिंदू लड़का जीत जो एक मुसलमान लड़की आलिया से प्यार करता था. फिर राजनैतिक कारणों से जब हिंदुस्तान के दो टुकड़े हुए, जीत, आलिया और करोड़ों लोगों की जिंदगियां पूरी तरह से तबाह हो गईं. फिल्म की कहानी वही है जो हम बचपन से सुनते, पढ़ते और देखते आए हैं. लेकिन मुश्किल यह है कि फिल्म बंटवारे के साथ जुड़े दर्द और तकलीफों को पूरी तरह से उभार नहीं पाई. माउंटबेटन और उनकी पत्नी की हिन्दुस्तानियों के प्रति हमदर्दी और बंटवारे के दौरान उनकी कोशिशें फिल्म में दिखाई तो गई हैं लेकिन ये एकतरफा दृष्टिकोण मालूम पड़ता है. फिल्म में किसी राज पर से पर्दा उठने की बात कही गई थी लेकिन अगर आप इतिहास और उससे जुड़ी किताबें, डाक्यूमेंट्री फिल्में देखने के शौकीन हैं तो इसमें आपके लिए कुछ नया नहीं होगा. जीत और आलिया की प्रेम कहानी भी आपको खुद से जोड़ नहीं पाती. यह फिल्म ‘गदर’ का टोनडाउन किया गया वर्जन भी लग सकता है. उतार-चढ़ाव के अभाव और फ्लैट स्टोरी-लाइन की वजह से हम इस फिल्म की कहानी को 2 स्टार दे रहे हैं. एक्टिंग: 3 स्टार फिल्म के असली हीरो माउंटबेटन ही हैं. भारत के आखिरी वाइसरॉय के रोल में हफ बॉनेविल की एक्टिंग सराहनीय है. उनकी पत्नी के किरदार में गिलियन एंडरसन का रोल भी सशक्त है. हिंदू लड़के जीत के किरदार में मनीष दयाल और मुसलमान लड़की आलिया की भूमिका में हुमा कुरैशी ने भी अच्छा काम किया है. फिल्म का आकर्षण ओम पुरी को माना जा रहा था लेकिन फिल्म में उनका रोल कुल मिलाकर 10 मिनट का भी नहीं है. गांधी, नेहरु और जिन्ना के किरदार में भी कलाकारों ने अच्छा काम किया है लेकिन हिंदी डबिंग के कारण कई डायलॉग्स की आत्मा मर सी गई है. एक्टिंग के लिए फिल्म को हम 3 स्टार दे रहे हैं. सिनेमेटोग्राफी: 3 स्टार्स  1947 में बसी फिल्म को सेपिया टोन में ही शूट किया गया है. कुछ असल फुटेज भी बीच-बीच में शामिल किये गए हैं. राष्ट्रपति भवन की भीतरी जिंदगी भी अच्छे तरीके से फिल्माई गई है. लेकिन कहीं-कहीं सबकुछ बहुत असहज और बनावटी लगता है. एआर रहमान का संगीत भी बहुत औसत सा ही लगा है. सिनेमेटोग्राफी के लिए हम इस फिल्म को 3 स्टार्स देंगे. कुल मिलाकर: 2.5 स्टार बीते समय में देश की आजादी और बंटवारे पर कई शानदार फिल्में बनी हैं जिन्हें दर्शकों ने ख़ूब पसंद भी किया. ‘रंग दे बसंती’, ‘दि लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह’ और इन जैसी तमाम फिल्मों के बीच गुरिंदर चड्ढा की यह फिल्म ‘पार्टीशन-1947’ बहुत बचकानी लगेगी. फिल्म देखकर यह समझ में आता है कि यह बहुत दिल लगाकर बनाई गई फिल्म है लेकिन पर्दे पर इसका परिमाण कोई कमाल नहीं कर पाया है. कुल मिलाकर हम इस फिल्म को 2.5 स्टार देंगे. ये भी पढ़ें: ‘लखनऊ सेंट्रल’ से निकलकर यरवदा जेल पहुंच गए फरहान अख्तर





Source