FILM REVIEW ‘Bunty Aur Babli 2’: 16 साल में कुछ तो बदलना चाहिए था ‘बंटी और बबली’ में?

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‘Bunty Aur Babli 2’ Film Review: दर्शकों को मूर्ख समझने की गलती हर निर्माता या निर्देशक कभी न कभी कर ही बैठता है. ताजा उदहारण है अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज यशराज फिल्म्स की ‘बंटी और बबली 2 (Bunty Aur Babli 2)’. इतनी बड़ी-बड़ी गलतियां कहानी में, इतनी बड़ी-बड़ी गलतियां निर्देशन में, इतनी बड़ी-बड़ी गलतियां अभिनेताओं के चयन में, इतनी बड़ी-बड़ी गलतियां तकरीबन हर डिपार्टमेंट में हैं कि इस सीक्वल को देखकर मन तो करता है कि लेखक, निर्देशक, अभिनेता और निर्माता को करबद्ध प्रार्थना की जाए- हे प्रभु, और नया सीक्वल बनाकर हमें मत सताना.

उम्मीद थी कि दर्शकों को एक ऐसी फिल्म की सौगात मिलेगी, जो 16 साल बाद नए तेवर, नए कलेवर और नई शैतानियों, नई स्कीम से सजी होगी, लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा. दर्शकों को मूर्ख समझकर फिल्म लिखी गई और पता नहीं किस कमर्शियल मजबूरी के तहत बनाई भी गई. अगर इस फिल्म को नहीं देखेंगे, तो कुछ भी मिस नहीं करेंगे. पहली बंटी और बबली लिखी थी जयदीप साहनी ने (चक दे इंडिया, खोसला का घोसला, रॉकेट सिंह सेल्समेन ऑफ़ द ईयर, शुद्ध देसी रोमांस और अन्य) निर्देशित की थी शाद अली (साथिया, झूम बराबर झूम) ने. जयदीप साहनी की लेखनी में एक खास बात है, वो विषय की डिटेल्ड रिसर्च करते हैं. हर किरदार की गहराई में जाते हैं और उसके परिवेश और लालन पालन के अनुसार उसे मैनरिज़्म देते हैं.

शाद अली एक फ़िल्मी परिवार से आते हैं और लखनऊ-कानपुर को भलीभांति समझते हैं जिस वजह से बंटी और बबली एकदम उत्तर प्रदेश के मिज़ाज को दिखाते नज़र आते थे. ये फिल्म 2005 में बनी थी, हीरो थे अभिषेक बच्चन और हीरोइन थीं रानी मुख़र्जी. अमिताभ बच्चन एकदम लाजवाब भूमिका में थे और ऐश्वर्या राय का “कजरारे” गीत बहुत मक़बूल भी हुआ था. फिल्म का संगीत भी धमाकेदार था, और बंटी और बबली की सिग्नेचर ट्यून भी बहुत चली थी. बंटी और बबली 2 में फिल्म लिखी निर्देशक वरुण ने है. वरुण पहले शाद और कबीर खान के साथ काम कर चुके हैं लेकिन फिल्म में कहीं भी उनकी प्रतिभा नज़र

ओरिजिनल और सीक्वल की तुलना स्वाभाविक है, लेकिन एक पल के लिए सब पूर्वाग्रह दूर हटा कर देखें तब भी फिल्म में स्क्रीन पर काम करने वाले कलाकारों को मूर्ख बना कर पैसा कमाने की स्कीम इतनी आसानी से दिखा दी जाती हैं कि दर्शक सर पीट लेते हैं. 16 साल का अंतराल इसलिए महत्वपूर्ण है कि इस दौरान ओटीटी प्लेटफॉर्म की दुनिया में एक से बढ़कर एक क्राइम और कॉमेडी या क्राइम-कॉमेडी फिल्में और वेब सीरीज दर्शकों ने देख लिए हैं. हाल ही में मनी हाइस्ट नाम के एक विश्व विख्यात शो का फाइनल सीजन भी करोड़ों दर्शकों ने देखा जिसमें क्राइम करने के लिए किस कदर प्लानिंग और शातिर दिमाग का इस्तेमाल किया जाता है उसका सर्वश्रेष्ठ नमूना दिखाया गया था. उसकी तुलना में 16 साल बाद भी गंगा बेचना, या अय्याश व्यापारियों को अय्याशी के लिए एक फ़र्ज़ी देश में भेजने वाले फ्रॉड या अनाज भंडार से अनाज चुराने के काम करना, बड़ा ही सतही नज़र आया है.

अभिषेक बच्चन के जीवन की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में बंटी और बबली का अपना अलग स्थान है. सीक्वल में उनका किरदार सैफ अली खान निभाते हैं जो स्वयं एक बेहतरीन अभिनेता है लेकिन ख़राब लिखे हुए रोल की वजह से फिल्म में बर्बाद किये गए हैं. बाहर निकलती तोंद अचानक से गायब हो जाती है और सैफ अपने सजीले अवतार में नज़र आने लगते हैं. सैफ का गेटअप भी ऐसा नहीं बनाया गया है कि सैफ उत्तर प्रदेश के रेलवे के टीटी लगें, शातिर चोर तो बहुत दूर की बात है. रानी मुख़र्जी ने ओरिजिनल में जितना धमाकेदार किरदार निभाया था उतना ही रंगहीन, सीक्वल में किरदार उन्हें मिला है. रानी देश की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्रियों में है, और अब यशराज फिल्म्स के काम काज में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. ऐसे में उनसे और उनके पति आदित्य चोपड़ा से कहानी और कहानी के फिल्मांकन में इस तरह की गलती अजीब लगती है.

यशराज की ही फिल्म मर्दानी में रानी ने जो कमाल किया है वो सब इस फिल्म में ख़त्म कर दिया है. सिद्धार्थ चतुर्वेदी को गली बॉय में देख कर बहुत उम्मीदें जगी थीं, वो फिर से सो गयी हैं, बंटी और बबली 2 देख कर. उन्होंने काफी कोशिश की है कि वो अभिनय में ऑथेंटिसिटी ला सकें मगर उत्तर प्रदेश का खालिसपन नहीं जमा. नयी अभिनेत्री शर्वरी पता नहीं क्या सोच कर ली गयी थीं. मुंबई में पली बढ़ी लड़की को परिवेश की समझ बिलकुल नहीं हैं. वो पहले असिस्टेंट डायरेक्टर रह चुकी हैं और उन्हें वही करना चाहिए. अभिनय उनके बस का है नहीं. पंकज त्रिपाठी जिन्हें जटायु सिंह का रोल मिला है वो टाइपकास्ट हो चुके हैं. पंकज लगातार काफी जगह नज़र आ रहे हैं. उनके रोल अलग अलग हैं लेकिन अभिनय तकरीबन एक जैसा ही कर रहे हैं. इस रोल में थोड़ी रंगीनियत है ज़रूर मगर चेहरे पर “पढ़ें न जा सकें” वाले भाव लेकर पंकज फिर वही गलती कर रहे हैं जो नवाज़ुद्दीन भी कर चुके हैं. बाकी कलाकार साधारण हैं, व्यर्थ हैं और मूर्ख बनने को आतुर हैं. क्यू क्यू कुरैशी की भूमिका में संजय मिश्रा नहीं हैं. फूलसखी (प्रतिमा काज़मी) नहीं हैं. बिना बात के प्रोटेस्ट करते राजेश विवेक भी नहीं हैं. ठग्गू के लड्डू नहीं हैं. बहुत कुछ नहीं है. और जो है वो देखने लायक नहीं है.

संगीत शंकर एहसान लॉय का है. ओरिजिनल बंटी और बबली के संगीत से तुलना करना मूर्खता ही होगी. लिरिसिस्ट अमिताभ भट्टाचार्य भी गुलज़ार नहीं हैं इसलिए गीत कुछ खास नहीं हैं, पॉपुलर हुए हैं थोड़े लेकिन फिल्म में ज़बरदस्ती ठूंसे हुए नज़र आते हैं. एक “लव जू” वाला थोड़ा गुनगुना सकते हैं लेकिन बाकि गाने व्यर्थ हैं. ऐसा कोई सगा नहीं जिसको ठगा नहीं वाली बात है नहीं. “तेरी बातों में किमाम की खुशबू है, तेरा आना गर्मियों की लू है” या “फिर आँखें भी कमाल करती हैं पर्सनल से सवाल करती हैं” गायब है. गुलज़ार की अदा वाला “धड़क धड़क धुंआ उड़ाए रे” या “देखना मेरे सर से आसमान उड़ गया है, देख न आसमान के सिरे मिल गए हैं ज़मीन से” बिलकुल लापता है. नयी फिल्म हैं, नए अभिनेता है, थोड़ा परिवेश अलग है तो गीत संगीत अभी अलग होना लाज़मी है लेकिन उसका फ्लॉप होना या गुनगुनाने लायक न होना स्वीकार्य नहीं है.

बंटी और बबली 2 समय की बर्बादी है. जिस फिल्म के ओरिजिनल में इतना दम था, उसके सीक्वल का इतना कमज़ोर होना समझ नहीं आया. ओरिजिनल बंटी और बबली में अभिषेक एक बात कहते हैं – ये हम नहीं, बंटी कह रहे हैं. उसी तर्ज़ पर – ये फिल्म बोरिंग है, ये हम नहीं दर्शक कह रहे हैं. दर्शकों को मूर्ख समझने की श्रृंखला में बंटी और बबली 2 का स्थान काफी ऊपर रहेगा.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

Tags: Bunty Aur Babli 2, Film review



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