मेहनत से हासिल की सफलता: 20 मीटिंग और 72 घंटों की कोशिश से जिंदा हुआ चार सालों में कबाड़ बन चुका आईसीयू

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औरंगाबाद8 मिनट पहलेलेखक: ओम प्रकाश सिंह

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डॉक्टर और नर्स को वीडियो कॉल से दिल्ली एम्स के डॉक्टरों से ट्रेनिंग दिलाई गई। 72 घंटे बाद ही आईसीयू और वेंटिलेटर शुरू हो गए।

  • दिल्ली एम्स से तकनीक सीख डॉक्टर ने दुरुस्त किए वेंटिलेटर

कोरोनाकाल के भयावह हालात में देशभर से खराब पड़े वेंटिलेटर और डॉक्टरों व टेक्निशियनों की कमी की खबरें सामने आ रही हैं। इस बीच औरंगाबाद ने देश के सामने मिसाल पेश किया है।

कम संसाधन, एक डॉक्टर और कुछ नर्सों की बदौलत वीडियो कॉल पर दिल्ली एम्स से तकनीक सीखकर चार साल से बंद पड़े और कबाड़ बन चुके आईसीयू के चार वेंटिलेटर को शुरू किया गया। इससे अब तक कई कोरोना मरीजों को जीवनदान दिया जा चुका है।

अब यह तकनीक देशभर में वहां लागू होगी जहां वेंटिलेंटर तो हैं, लेकिन डॉक्टर और टेक्निशियन नहीं हैं। राज्य व केन्द्र सरकार इस मॉडल काे लागू कर खराब पड़े वेंटिलेटर को शुरू कराएंगी।

जानिए कबाड़ आईसीयू शुरू करने की पूरी कहानी

सदर अस्पताल में करीब चार साल पहले पौने तीन करोड़ की लागत से आईसीयू का निर्माण हुआ था। इसके चार वेंटिलेटर कबाड़ बन चुके थे। कोरोना की दूसरी लहर में डीएम सौरभ जोरवाल ने बंद पड़े आईसीयू के वेंटिलेटर शुरू कराने का जिम्मा डॉ. जन्मेजय को दिया। डॉक्टर और नर्स को वीडियो कॉल से दिल्ली एम्स के डॉक्टरों से ट्रेनिंग दिलाई गई। 72 घंटे बाद ही आईसीयू और वेंटिलेटर शुरू हो गए।

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