सुशील कुमार…एक चैंपियन पहलवान या एक गुनहगार?

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नई दिल्ली. भारतीय खेलों के इतिहास में पहलवान सुशील कुमार (Sushil Kumar) की कहानी प्रेरणा का स्त्रोत थी लेकिन अब अफसोस की बात है कि उनकी कहानी को चेतावनी के तौर युवाओं को सुनाई जायेगी. यही सबसे बड़ी विडंबना है. सुशील की तरह मैदान में कामयाबी हासिल करना लेकिन मैदान के बाहर उसकी तरह भटकना मत. अखाड़ों और मैट पर सुशील ने इससे बड़े दर्द झेलें होंगे लेकिन दिल्ली पुलिस ने जब उन्हें सावर्जनिक तौर पर गिरफ्तार किया तो इस चोट ने इस खिलाड़ी के मन पर जो मार की होगी उसे दुनिया की कोई भी दवा शायद ही ठीक कर पाये. किसी चैंपियन के पास साख के अलावा होता ही और क्या है? ये सही बात है कि सुशील को फिलहाल सिर्फ संगीन आरोपों के आधार पर गिरफ्तार किया है, उन पर मुकदमा चलेगा, सुनवाई होगी, सालों साल ये मुद्दा खिंचता रहेगा और अंत में शायद नवजोत सिद्धू की तरह वो भी बरी हो कर निकल जायें लेकिन साख का जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई शायद ही कभी हो पाये. किसी भी खिलाड़ी के लिए पैसे, ग्लैमर और जीत से ज़्यादा अहम अक्सर साख ही तो होती है. आखिर किसी गोल्ड मैडल या वर्ल्ड कप की कीमत क्या होती है कुछ भी नहीं.. लेकिन इसको जीतने के बाद जो नाम हासिल होता है, जो अमरत्व खिलाड़ी हासिल करतें ंहैं उसे तो अरबों रुपये खर्च करके भी नहीं खरीदा जा सकता है. नाम रौशन करने वाला खेल के लिए बदनामी भी लायेगा… सुशील कुमार का व्यक्तित्वसाल 2001 के मई के महीने में इस लेखक को अपनी पत्रकारिता के करियर की पहली टीवी रिपोर्ट के लिए दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम की तरफ रुख करना पड़ा. कहानी पहलवान चंदगी राम के जीवन और उनके प्रभाव पर थी तो महाबली सतपाल महाराज का इटंरव्यू करना था. उसी समय सतपाल ने एक बेहद होनहार और युवा पहलवान सुशील से हमारा परिचय ये कहकर करवाया कि देखना ये लड़का भारत का नाम रौशन करेगा और आप सिर्फ इसका इंटरव्यू करने के लिए आयेंगे. मेरे कैमरामैन ने मुझे इशारा किया कि अभी ही सुशील का एक छोटा इंटरव्यू कर लिया जाए जिसे चंदगी राम वाली रिपोर्ट में शामिल किया जा सकता है. मैनें ठीक वैसा ही किया. बेहद विनम्र और नाम के हिसाब से बिलकुल सुशील की छवि ज़ेहन में हमेशा के लिए कैद हो गई. इसके बाद मैं क्रिकेट की रिपोर्टिंग में ज़्यादा व्यस्त हो गया लेकिन 2004 एथेंस गेम्स के दौरान मेरे एक साथी टीवी पत्रकार ने बताया कि वाकई में सुशील में दम क्योंकि वो पहला ओलंपिक में वो पहला राउंड बेहद शानदार तरीके से जीते थे और दूसरे राउंड में जिस खिलाड़ी से वो हारे उसी ने आखिर में गोल्ड मेडल जीता. इस दौरान अगले कुछ सालों में सुशील से एक-दो मुलाकातें हुईं जहां पर मैं उन्हें पहले इंटरव्यू की बातें याद दिलाता औऱ वो उसी नम्र तरीके से बात को याद करते हुए मुस्करा देते थे. क्या हम सब असली सुशील को पहचान नहीं पाये? पहली बार बीजिंग ओलंपिक में मेडल जीतने के बाद भी सुशील का रवैया वैसा ही रहा. बाद में मेरे कई और साथी पत्रकारों ने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया कि यार सुशील जैसा कोई नहीं. क्रिकेटरों की तुलना करते हुए वो अक्सर ये दलील देते थे कि भारत के लिए सिर्फ दो-चार मैच खेलने के बाद क्रिकेटर ज़मीनी हकीकत से दूर हो जाते हैं लेकिन सुशील को देखो. भारतीय इतिहास में अकेले दम पर दो ओलंपिक मेडल जीतने वाला खिलाड़ी उसी तरह ज़मीन से जुड़ा है. उतना ही सुशील है. कामयाबी ने उसकी शख्सियत बिलकुल नहीं बदली है.
रियो ओलंपिक्स से पहले बदल गए सुशील! रियो ओलंपिक्स से ठीक पहले सुशील में अब बदलाव दिखने लगा था. अब सुशील विवाद का हिस्सा बनते जा रहे थे. हर किसी को एहसास था कि नरसिंह यादव ओलंपिक के लिए बेहतर दावेदार थे लेकिन चैंपियन सुशील हर कीमत पर अपने मेडल का रंग एक बार फिर से बदलने की हठ में थे. आखिरकार, सुशील लाख चाहने के बावजूद रियो नहीं जा पाये और न्यूज़ 18 के ही टीवी चैनल्स में एक्सपर्ट की भूमिका में नज़र आये. इसी दौरान सुशील से फिर से लाइव टीवी के दौरान ऑन एअर मुलाकातें हुई लेकिन दो दशक पुराने सुशील और दो बार के ओलंपिक चैंपियन सुशील में फर्क करना अब भी मुश्किल था. और यही बात सबसे बड़ी विडंबना है और कचोट पहुंचाती है. क्या हम सब असली सुशील को पहचान नहीं पाये? क्या हम सभी चैंपियन सुशील की अंधभक्ति में ये भूल गये कि वो भी इसी समाज का हिस्सा है…हांड-मांस का बना है.. अच्छे-बुरे लोगों के संपर्क में आता है और शायद उसका भी रवैया बदल सकता है. संगत से गुण आत है तो संगत से गुण जात.. और शायद यही अंतर है क्रिकेट और बाकि पेशेवर तरीके से चलने वाले खेलों में. जहां एक विराट कोहली और रोहित शर्मा को शुरु से ये ट्रेनिंग मिलने लगती है कि उन्हें किस तरह की संगति रखनी है और किस तरह सार्वजनिक मंच पर खुद को पेश करना है. इतना ही नहीं चाहे सानिया मिर्जा हों या फिर सायना नेहवाल, पीवी सिंधु हों या फिर अभिनव बिंद्रा, इन तमाम एथलीटों ने ये दिखाया कि कैसे वो कामयाबी और ग्लैमर को संयमित तरीके से स्वीकार कर सकते हैं. वहीं सुशील कुमार जैसे चैंपियन अब भी उन्हीं पहलवानों से दिन रात घिरे रहते थे जिनके चरित्र और चाल चलन को लेकर अकसर दबी ज़ुबां में हर कोई ये कहता था कि आखिर ये शख्स छत्रसाल में सुशील के साथ क्यों दिखता है.. अंग्रेज़ी में एक पुरानी कहावत है कि एक आदमी अपनी संगति से ही जाना जाता है.. हिंदी में भी ये मशहूर वाक्या है कि संगत से गुण आत है तो संगत से गुण जात.. चैंपियन खिलाड़ियों के लिए नैतिकता का मानदंड काफी ऊंचा सुशील के चाहने वालों के लिए आगे की राह बहुत मुश्किल है. उन्हें आने वाली पीढ़ी को ये समझाना कठिन होगा कि सुशील कुमार की कहानी सिर्फ एक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. किस तरह से मुश्किलों का सामना करके सुशील चैंपियन बना और भारतीय पहलवानी का चेहरा बदल दिया वो इस बात में मिट्टी में नहीं मिलनी चाहिए कि कुछ साल के आपराधिक घटनाओं और आरोपों ने सब कुछ पलक झपकते ही ख़त्म कर दिया. इतिहास शायद भविष्य में ये तर्क दे कि सुशील की पूरी कहानी एक अपराधी की नहीं बल्कि एक चैंपियन की है जो कुछ वक्त के लिए भटक गया था. लेकिन, आप क्या मोहम्मद अज़हरुद्दीन को माफ कर पायें हैं? क्या अब लोग अजय जडेजा की शानदार क्रिकेट ज्ञान की बातें कर उनकी वाहवाही करते हैं या कोई श्रीसंत की लाजवाब आउट स्विंगर की चर्चा भी करता है? लोग अक्सर नेताओं के भ्रष्टाचार की ख़बरों को आसानी से भुला देते हैं क्योंकि एक धारणा है कि अरे राजनीति में तो ये हर कोई करता है. फिल्मी-सितारों की भी ग़लतियों को लोग अक्सर आसानी से भुला देते हैं. लेकिन खिलाड़ियों के लिए ख़ासकर चैंपियन खिलाड़ियों के लिए फैंस और लोग नैतिकता का मानदंड काफी ऊंचा कर देते हैं. ये शायद सही नहीं है लेकिन खेल और खिलाड़ियों को जो दिल से इज्जत मिलती है उसे कोई नेता या फिर फिल्म स्टार कभी सपने में भी हासिल नहीं कर सकता है. इसलिए, जब खिलाड़ी कोई बड़ी चूक करता है तो उसके लिए लोग आसानी से माफ करने के मूड में नहीं दिखते हैं. सुशील कुमार की कहानी अब दो अलग अलग किस्म की शख्सियतों के बोझ का शिकार होती दिख रही है. पाठक के तौर पर शायद आपको खुद ये तय करना है कि सुशील को आप एक चैंपियन पहलवान की तरह याद करना चाहेंगे या फिर एक गुनाहगार के तौर पर.





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