Dingko Singh: एशियन गेम्स से पहले बदली वेट कैटेगरी फिर भी जीता गोल्ड, एक गलती से खत्म हुआ करियर

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नई दिल्ली. बैंकॉक एशियन गेम्स में गोल्ड जीतने वाले भारतीय मुक्केबाज डिंको सिंह (Dingko Singh) का 42 साल की उम्र में निधन हो गया. वो पिछले कुछ सालों से लिवर कैंसर से जूझ रहे थे. कुछ साल पहले सर्जरी के बाद उनके लिवर का बड़ा हिस्सा निकाल दिया गया था. पिछले साल वो कोरोनावायरस से भी संक्रमित हुए थे. लेकिन वो ये जंग तो जीत गए, लेकिन जिंदगी से चल रही लड़ाई हार गए. डिंको सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं. उन्होंने 1998 के बैंकॉक एशियन गेम्स में 54 किलो वैट कैटेगरी में गोल्ड जीतकर देश में बॉक्सिंग को नई पहचान दी थी.

डिंको की इस उपलब्धि के बाद बॉक्सिंग देश में तेजी से लोकप्रिय हुआ और आगे चलकर विजेंदर सिंह, अखिल कुमार, एमसी मैरीकॉम और सरिता देवी जैसे मुक्केबाज सामने आए. उनके एशियन गेम्स में पहला गोल्ड जीतने की कहानी भी काफी दिलचस्प है. उन्हें पहले बैंकॉक गेम्स के लिए चुनी गई भारतीय बॉक्सिंग टीम में जगह दी गई थी. लेकिन बाद में उन्हें टीम से ड्रॉप कर दिया गया था. वो इससे इतना आहत हुए थे कि तब तक शराब पीते रहे, जब तक गिर नहीं गए. हालांकि, उन्हें दोबारा टीम में चुना गया और इस मुक्केबाज ने गोल्ड जीतकर अपनी काबिलियत साबित की.

एशियन गेम्स में गोल्ड जीतने पर मिला था अर्जुन पुरस्कार

बैंकॉक एशियन गेम्स के 54 किलो वर्ग के फाइनल में डिंको ने उज्बेकिस्तान के मुक्केबाज तिमुर तुल्याकोव को शिकस्त दी थी. डिंको इस मुकाबले में कितने हावी थे, अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि चौथे राउंड के बाद तिमुर को रिटायर होना पड़ा और गोल्ड डिंको के खाते में आया. उनका गोल्ड जीतना इसलिए भी खास था. क्योंकि वो एशियन गेम्स से कुछ महीने पहले ही 51 से 54 किलो वैट कैटेगरी में आए थे. इसी साल उन्हें अर्जुन पुरस्कार भी मिला और 2013 में इस मुक्केबाज को देश का चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्मश्री मिला.2017 में डिंको सिंह को लिवर कैंसर का पता चला

इस मुक्केबाज की जिंदगी ने 2017 में करवट ली. उन्हें इसी साल लिवर कैंसर का पता चला. सर्जरी के बाद उनके लिवर का बड़ा हिस्सा निकाल दिया गया था. इसके इलाज के लिए उन्हें इनाम में मिला इंफाल का अपना घर तक बेचना पड़ा. बाद में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स पटियाला में कोच की नौकरी भी छोड़नी पड़ी. तब पूर्व भारतीय बल्लेबाज गौतम गंभीर ने भी इस मुक्केबाज के लिए मदद के हाथ बढ़ाए थे. पिछले साल उनकी तबियत ज्यादा खराब होने के बाद उन्हें मणिपुर से दिल्ली एयरलिफ्ट भी किया गया था. हालांकि उनकी रेडिएशन थेरेपी फिर भी नहीं हो सकी, क्योंकि उन्हें पीलिया हो गया. इसके बाद इस मुक्केबाज को फिर 2400 किमी की सड़क यात्रा से एंबुलेंस में मणिपुर ले जाया गया था.

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कैंसर से जूझने के बाद भी कोचिंग देते रहे

डिंको मुक्केबाज को कितना अधिक चाहते थे कि कैंसर से जूझने के बाद भी वो जब भी मणिपुर में रहते तो साई सेंटर में रोज 30 किलोमीटर का सफर तय करके युवा खिलाड़ियों को मुक्केबाजी के गुर सिखाने पहुंच जाते थे. लंदन ओलंपिक में महिला मुक्केबाजी में ब्रॉन्ज जीतने वाली मैरीकॉम के बॉक्सिंग शुरू करने के पीछे भी डिंको सिंह का हाथ ही था. वो कई बार इस बात को कह चुकी थीं.

फेडरेशन की उदासीनता के कारण करियर खत्म हुआ

इंफाल में हुए 1999 के राष्ट्रीय खेलों में, वह फाइनल में पहुंचे थे. लेकिन बिरजू साहा के बाहर होने के बाद वो मुकाबला नहीं खेला जा सका. अपने स्टार मुक्केबाज को देखने के लिए हजारों फैंस पहुंचे थे. ऐसे में एक प्रदर्शनी मैच कराया गया और आंध्र प्रदेश के मुक्केबाज श्रीरामुलू से डिंको सिंह का मुकाबला हुआ. हालांकि, इस मैच में डिंको की कलाई टूट गई. इसके फौरन बाद उन्हें ट्रेनिंग के लिए क्यूबा जाना था. उनके हाथ में प्लास्टर लगा था. फेडरेशन को डर था कि अगर डिंको नहीं गए थे तो ट्रेनिंग कैंप कैंसिल हो जाएगा. तब अफसरों ने जानबूझकर उनका प्लास्टर उतरवाया और एक सम्मान समारोह में, जिसमें तत्कालीन खेल मंत्री उमा भारती मौजूद थी, उसमें डिंको सिंह पहुंचे.

डिंको के लिए ये फैसला भारी पड़ा. क्योंकि वो कभी इस चोट से उबर नहीं पाए और उनका करियर वक्त के पहले ही खत्म हो गया.





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