रूस को रोकेने साथ आ रहे NATO देश: अमेरिका और उसके दोस्त फिर हो रहे इकट्ठा, दुनिया में नए कोल्ड वॉर की आहट

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15 मिनट पहले

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1992 में सोवियत यूनियन के टूटने के बाद अमेरिका और उसके यूरोपीय दोस्तों के सैन्य गठबंधन नाटो का महत्व अचानक से कम हो गया। जियो पॉलिटिक्स के एक्टपर्ट्स ने दावा किया कि अगर आने वाले वक्त में नाटो यूरोप से बाहर कोई बड़ा रोल नहीं निभाता तो इसकी अहमियत खत्म हो जाएगी। इन सब के बीच जब रूस ने 2014 में क्रीमिया पर कब्जा किया तब पॉवर बैलेंस के लिए नाटो की जरूरत महसूस की जाने लगी। अब जबकि रूस ने यूक्रेन की बॉर्डर पर 1.5 लाख से ज्यादा सैनिक तैनात कर दिए हैं तो नाटो केंद्रीय भूमिका में आ गया है।

पुतिन की आक्रमक नीतियों ने बदले हालात

नाटो के सदस्य देश अपने आपसी विवादों से जूझ रहे थे, लेकिन पुतिन की आक्रमक नीतियों ने हालत बदल दिए हैं।

नाटो के सदस्य देश अपने आपसी विवादों से जूझ रहे थे, लेकिन पुतिन की आक्रमक नीतियों ने हालत बदल दिए हैं।

अमेरिका के सीनियर इंटेलिजेंस अफसर एंड्रिया केंडल-टेलर का कहना है कि अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे और ऑस्ट्रेलियाई पनडुब्बी सौदे में फ्रांस के अपमान के बाद हालात बदल गए थे। एक वक्त यह महसूस किया गया था कि नाटो में कई खामियां हैं, और इसके सदस्य देशों के बीच के रिश्तों पर विचार किया जा रहा था। लेकिन रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की आक्रमक नीतियों और धमकियों ने नाटो को 1992 से पहले वाली स्थिति में वापस ला दिया है। इस हफ्ते नाटो के 30 सदस्य देशों ने एक साथ आकर इस संगठन में एक नई जान डाल दी है।

रूस को रोकना नाटो के डीएनए में

अन्ना वीजलैंडर का कहना है कि रूस को रोकना नाटो के DNA में है।

अन्ना वीजलैंडर का कहना है कि रूस को रोकना नाटो के DNA में है।

स्वीडन के सिक्योरिटी एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के हेड अन्ना वीजलैंडर का कहना है कि रूस को रोकना नाटो के DNA में है, क्योंकि रूस यूरोपीय देशों के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर सकता है। वहीं, सेंटर फॉर यूरोपियन रिफॉर्म की सिक्योरिटी ऐनालिस्ट सोफिया बेस्च ने कहा- नाटो को इसके सहयोगियों ने मिलकर बनाया है। नाटो का महत्व कभी कम नहीं हुआ, क्योंकि हमने इसे होने नहीं दिया। एक वक्त पर मजाक में पूछा जाता था कि अगर नाटो जवाब है, तो सवाल क्या है? सोफिया बेस्च ने रूस की तरफ इशारा करते हुए कहा कि सालों पहले सवाल बदल गया था, अब हम फिर से पुराने सवाल पर वापस आ गए हैं।

बंटा हुआ अमेरिका और कमजोर राष्ट्रपति

पुतिन बंटे हुए अमेरिका और कमजोर राष्ट्रपति का फायदा उठना चाहते हैं।

पुतिन बंटे हुए अमेरिका और कमजोर राष्ट्रपति का फायदा उठना चाहते हैं।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि पुतिन ने यूरोपीय देशों की आपस में खींचतान, बंटे हुए अमेरिका और कमजोर राष्ट्रपति को एक मौके के रूप में देखा। वो इसका फायदा उठाना चाहते हैं। भेल ही नाटो के देश अभी एक साथ हैं, लेकिन अब तक इनकी एकता को परखा नहीं गया है। यह सभी देश मुश्किल वक्त में एक साथ रहेंगे या नहीं इसके बारे में अभी से कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। हालांकि, नाटो बाल्टिक कंट्रीज और पोलैंड के साथ उन देशों के लिए काफी महत्वपूर्ण है जिनकी सीमा रूस के साथ लगती है।

रूस की अमेरिका को चेतावनी

डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो का मजाक उड़ाते हुए इसे छोड़ने की धमकी दी थी।

डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो का मजाक उड़ाते हुए इसे छोड़ने की धमकी दी थी।

रूस के राष्ट्रपति पुतिन लगातार नाटो को रोकने के लिए अमेरिका को चेतावनी देते रहे हैं। रूस की तरफ यह आरोप भी लगाया जाता रहा है कि अमेरिका उसे बदनाम करने के लिए झूठी खबरें फैलाता है। अमेरिका का असल मकसद नाटो का विस्तार करना है, लेकिन उसे रूस के साथ सीमा साझा करने वाले देशों से नाटो फोर्स को हटा लेना चाहिए

2014 में रूस के क्रीमिया पर कब्जे के बाद भी नाटो कमजोर बना हुआ था। उसके सदस्य देशों में उद्देश्य और एकता की कमी नजर आ रही थी। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसका मजाक उड़ाते हुए इसे छोड़ देने की धमकी दी थी। वहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने इसके “ब्रेन डेथ” पर शोक भी व्यक्त किया था।

आखिर क्या है नाटो?

नाटो का पूरा नाम नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) है। यह यूरोपियन और नॉर्थ अमेरिकन देशों के मिलिट्री ग्रुप है। 1949 में इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य सोवियत यूनियन की घेराबंदी और साम्यवादी विचारधारा के प्रभाव को रोकना था। इसमें फ्रांस, बेल्जियम, लक्जमर्ग, ब्रिटेन, नीदरलैंड, कनाडा, डेनमार्क, आइसलैण्ड, इटली, नार्वे, पुर्तगाल, अमेरिका, पूर्व यूनान, टर्की, पश्चिम जर्मनी और स्पेन शामिल थे।

इसके अलावा 1954 में साउथ ईस्ट एशिया ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (SEATO) की स्थापना की गई थी। इसमें ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, फिलीपीन्स, थाईलैंड, पाकिस्तान और अमेरिका शामिल थे।

नाटो के टक्कर में रूस ने किया वारसा पैक्ट

अमेरिका के मिलिट्री ग्रुप के खिलाफ रूस ने साम्यवादी देशों को इकट्ठा कर 1955 में वारसा पैक्ट किया था। इसमें सोवियत संघ, पोलैंड, पूर्वी जर्मनी, चैकोस्लोवाकिया, हंगरी, रोमानिया और बुल्गारिया शामिल थे। 1992 में सोवियत यूनियन के टूटने के बाद कभी उसका हिस्सा रहे देश कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, आर्मेनिया, बेलारूस, ताजिकिस्तान और रूस ने मिलकर कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (CSTO) की स्थापना की थी।

वो देश जो न रूस के साथ और न ही अमेरिका के साथ

अमेरिका और रूस के सैन्य गठबंधन के बाहर भारत, युगोस्लाविया, इंडोनेशिया, मिस्र, और घाना ने 1 सितम्बर 1961 को मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत की थी। इस आंदोलन के सदस्य देश न तो अमेरिका के साथ रहे और न ही रूसी खेमे में शामिल हुए।

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